- डीजीपी (DGP) उत्तराखंड दीपम सेठ का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस का प्राथमिक कार्य अपराध रोकना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि निजी विवादों को सुलझाना।
सिविल मामले (Civil Cases) वे होते हैं जो मुख्य रूप से व्यक्तियों, संस्थाओं या संगठनों के बीच के निजी विवादों से संबंधित होते हैं। इनमें किसी को जेल भेजने के बजाय आमतौर पर नुकसान की भरपाई (Compensation) या अधिकारों की बहाली पर जोर दिया जाता है।
यहाँ मुख्य सिविल मामलों की सूची दी गई है:
1. संपत्ति और जमीन के विवाद (Property Disputes)
* जमीन के मालिकाना हक (Ownership) को लेकर झगड़ा।
* किरायेदार और मकान मालिक के बीच विवाद।
* पुश्तैनी जमीन का बंटवारा।
* कब्जे (Possession) से संबंधित मामले।
2. पारिवारिक मामले (Family Matters)
* तलाक (Divorce) और अलग होना।
* बच्चों की कस्टडी (Child Custody)।
* भरण-पोषण (Maintenance/Alimony)।
* गोद लेना या उत्तराधिकार (Inheritance) के मामले।
3. अनुबंध या कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन (Breach of Contract)
* दो पार्टियों के बीच हुए समझौते का पालन न करना।
* व्यापारिक लेन-देन में शर्तों को तोड़ना।
* नौकरी या सेवा से जुड़े अनुबंधों के विवाद।
4. टॉर्ट्स (Torts/Civil Wrongs)
* मानहानि (Defamation): किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना।
* लापरवाही (Negligence): किसी की लापरवाही से दूसरे को आर्थिक या शारीरिक नुकसान होना।
* अतिचार (Trespass): बिना अनुमति किसी की निजी संपत्ति में प्रवेश करना (जब तक कि वह आपराधिक मंशा से न हो)।
5. पैसे की वसूली (Recovery of Money)
* उधार दिए गए पैसे वापस न मिलना।
* चेक बाउंस के कुछ मामले (हालांकि ये अब अर्ध-आपराधिक श्रेणी में भी आते हैं)।
पुलिस हस्तक्षेप क्यों नहीं कर सकती?
* अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction): सिविल मामलों का निपटारा केवल दीवानी न्यायालय (Civil Court) द्वारा किया जाता है। पुलिस के पास यह तय करने का कानूनी अधिकार नहीं है कि जमीन किसकी है या समझौता क्या होना चाहिए।
* भ्रष्टाचार की संभावना: अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस पर किसी एक पक्ष का पक्ष लेने या दबाव बनाने के आरोप लगते हैं, इसीलिए डीजीपी ने ‘कठोर कार्यवाही’ की चेतावनी दी है।
साधारण शब्दों में: अगर झगड़े में मारपीट, चोरी, या कोई बड़ा अपराध (Criminal offense) नहीं हुआ है और मामला केवल ‘हक’ या ‘पैसे’ का है, तो वह सिविल मामला है।





